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बाबा नागार्जुन : वो जनकवि जिसने, रोज़ी-रोटी, सूअर, कटहल और जन-गण-मन तक सब पर लिखा
हम अपने आस पास, बहुत सारी चीजों को देखते हैं और उन्हें नकारते या नजरअंदाज करते हुए निकल जाते हैं मगर एक कवि ऐसा नहीं कर पाता वो भी तब जब वो बाबा नागार्जुन जैसा कवि हो, जिसने आम आदमी के बीच बैठकर उनकी पीढ़ा को महसूस किया और उनकी व्यथा को जिया हो.
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